श्री हरि विष्णु एकादशी व्रत एवं तुलसी दल अर्चन: संपूर्ण शास्त्रीय विधि, महत्व एवं उज्जैन में अनुष्ठान रहस्य
१. अनुष्ठान की पृष्ठभूमि एवं शास्त्रोक्त महत्व
पद्मपुराण के अनुसार सभी व्रतों में एकादशी व्रत सर्वश्रेष्ठ माना गया है। देवशयनी, देवप्रबोधिनी, निर्जला, मोक्षदा एवं कामदा एकादशी पर भगवान नारायण का तुलसी पत्र, पीले पुष्प एवं फल से पूजन करने से मानसिक शुद्धि और जन्म-जन्मांतर के पापों का शमन होता है।
२. पूजा का मूल उद्देश्य एवं प्राप्त होने वाले फल
आत्मिक शांति, मोक्ष मार्ग की सुगमता, पितृ तृप्ति एवं श्री नारायण की अविचल भक्ति।
४. शास्त्रसम्मत पूजन विधि-विधान (क्रमबद्ध चरण)
1. प्रातः संकल्प एवं शुद्धि
2. शालिग्राम अथवा विष्णु विग्रह पंचामृत अभिषेक
3. विष्णु सहस्रनाम द्वारा 1008 तुलसी अर्चन
4. उस एकादशी की विशेष पौराणिक कथा श्रवण
5. फल, मेवे व माखन भोग अर्पण
6. संध्या दीपदान, एकादशी महाआरती एवं प्रसाद
५. आवश्यक पावन पूजन सामग्री
इस वैदिक अनुष्ठान में १००% शुद्ध एवं प्राकृतिक शास्त्रीय सामग्री का उपयोग किया जाता है: 1008 ताजे तुलसी दल, शालिग्राम शिला/विष्णु प्रतिमा, पीला चंदन, पंचामृत, पीले पुष्प, पीतांबर, फल, मेवे एवं दक्षिणा।।
७. अवंतिका तीर्थ (उज्जैन) में अनुष्ठान का विशेष प्रभाव
महाकाल की पावन नगरी उज्जैन (अवंतिका) अनादि काल से मोक्ष और ग्रह शांति की तपोभूमि रही है। यह अनुष्ठान विशेष रूप से Ujjain, Madhya Pradesh पर वैदिक पुरोहितों द्वारा यजमान के नाम एवं गोत्र से संपन्न किया जाता है।
८. व्यक्तिगत संकल्प: साक्षात उपस्थिति अथवा लाइव वीडियो दर्शन
देश-विदेश के जो यजमान साक्षात उज्जैन आने में असमर्थ हैं, वे अपने नाम, गोत्र व नक्षत्र अनुसार लाइव ऑनलाइन संकल्प द्वारा भी इस अनुष्ठान को संपन्न करा सकते हैं। पूजनोपरांत अभिमंत्रित रक्षासूत्र, भस्म एवं महाप्रसाद डाक द्वारा यजमान के गृह पते पर प्रेषित किया जाता है।
पंडित बलराम व्यास
उज्जैन अवंतिका क्षेत्र के प्रतिष्ठित वैदिक पुरोहित। विगत 15+ वर्षों से श्री महाकालेश्वर, मंगलनाथ तीर्थ, सिद्धवट एवं रामघाट पर शास्त्रसम्मत विधि-विधान से कालसर्प दोष, मंगल भात पूजा, पितृ दोष शांति, महामृत्युंजय जप एवं संपूर्ण वैदिक अनुष्ठान संपन्न करा रहे हैं।
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