संकष्टी चतुर्थी विघ्नहर्ता पूजन एवं दूर्वा अर्पण: संपूर्ण शास्त्रीय विधि, महत्व एवं उज्जैन में अनुष्ठान रहस्य
१. अनुष्ठान की पृष्ठभूमि एवं शास्त्रोक्त महत्व
संकष्टी चतुर्थी का अर्थ है "संकटों को हरने वाली चतुर्थी"। भविष्य पुराण के अनुसार जब देवताओं पर कोई महासंकट आता था, तो वे भगवान गणेश की शरण लेते थे। इस दिन व्रत रखकर संध्या समय गणेश जी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है, 21 दूर्वा दल अर्पित किए जाते हैं, तिल-गुड़ के लड्डुओं का भोग लगता है तथा चंद्रोदय के समय शंख में जल, दूध और अक्षत भरकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इससे बड़े से बड़ा संकट भी सहज टल जाता है।
नारद पुराणोक्त "संकटनाशन गणेश स्तोत्र" के पाठ से 6 माह के भीतर मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।
२. पूजा का मूल उद्देश्य एवं प्राप्त होने वाले फल
कठिन संकटों व समस्याओं से मुक्ति, संतान के कष्टों का निवारण, मानसिक तनाव में शांति एवं कार्य में सफलता।
३. सिद्ध वैदिक मंत्र एवं स्तोत्र
४. शास्त्रसम्मत पूजन विधि-विधान (क्रमबद्ध चरण)
1. पवित्रीकरण एवं व्रत संकल्प
2. गणेश जी का पंचामृत अभिषेक एवं सिंदूर लेपन
3. 21 दूर्वा दलों का 'ॐ गं गणपतये नमः' से अर्पण
4. संकटनाशन गणेश स्तोत्र के 11 पाठ
5. तिल एवं गुड़ के लड्डुओं का महाभोग
6. चंद्रोदय के समय शंख द्वारा चंद्रमा को दुग्ध मिश्रित अर्घ्य
7. महाआरती एवं व्रत पारायण
५. आवश्यक पावन पूजन सामग्री
इस वैदिक अनुष्ठान में १००% शुद्ध एवं प्राकृतिक शास्त्रीय सामग्री का उपयोग किया जाता है: 21 दूर्वा दल, तिल-गुड़ के लड्डू, शुद्ध सिंदूर, गाय का दूध, रोली, अक्षत, शंख, कर्पूर, तांबे का अर्घ्य पात्र।।
६. वैदिक हवन एवं पूर्णाहुति विधान
गणेश बीज मंत्र से 21 आहुतियों का संक्षिप्त हवन।
७. अवंतिका तीर्थ (उज्जैन) में अनुष्ठान का विशेष प्रभाव
महाकाल की पावन नगरी उज्जैन (अवंतिका) अनादि काल से मोक्ष और ग्रह शांति की तपोभूमि रही है। यह अनुष्ठान विशेष रूप से घर पर अथवा उज्जैन आश्रम पर वैदिक पुरोहितों द्वारा यजमान के नाम एवं गोत्र से संपन्न किया जाता है।
शुभ दिन एवं मुहूर्त: प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी (संकष्टी चतुर्थी) एवं अंगारक चतुर्थी। सायंकाल / चंद्रोदय का समय।
८. व्यक्तिगत संकल्प: साक्षात उपस्थिति अथवा लाइव वीडियो दर्शन
देश-विदेश के जो यजमान साक्षात उज्जैन आने में असमर्थ हैं, वे अपने नाम, गोत्र व नक्षत्र अनुसार लाइव ऑनलाइन संकल्प द्वारा भी इस अनुष्ठान को संपन्न करा सकते हैं। पूजनोपरांत अभिमंत्रित रक्षासूत्र, भस्म एवं महाप्रसाद डाक द्वारा यजमान के गृह पते पर प्रेषित किया जाता है।
पंडित बलराम व्यास
उज्जैन अवंतिका क्षेत्र के प्रतिष्ठित वैदिक पुरोहित। विगत 15+ वर्षों से श्री महाकालेश्वर, मंगलनाथ तीर्थ, सिद्धवट एवं रामघाट पर शास्त्रसम्मत विधि-विधान से कालसर्प दोष, मंगल भात पूजा, पितृ दोष शांति, महामृत्युंजय जप एवं संपूर्ण वैदिक अनुष्ठान संपन्न करा रहे हैं।
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