यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार एवं गायत्री दीक्षा: संपूर्ण शास्त्रीय विधि, महत्व एवं उज्जैन में अनुष्ठान रहस्य
१. अनुष्ठान की पृष्ठभूमि एवं शास्त्रोक्त महत्व
उपनयन का शाब्दिक अर्थ है "ईश्वर के समीप ले जाना"। यह संस्कार बालक को विद्यार्थी से द्विज (आत्मिक रूप से जागृत) बनाता है। तीन तारों वाला जनेऊ देव-ऋण, पितृ-ऋण और ऋषि-ऋण का स्मरण कराता है। गुरु द्वारा कान में गुप्त गायत्री मंत्र देकर संध्यावंदन और सदाचार का संकल्प कराया जाता है।
२. पूजा का मूल उद्देश्य एवं प्राप्त होने वाले फल
आत्मिक तेज, एकाग्रता, ब्रह्मचर्य पालन, विद्या अध्ययन में सर्वोच्च सफलता एवं वैदिक संस्कारों की प्राप्ति।
४. शास्त्रसम्मत पूजन विधि-विधान (क्रमबद्ध चरण)
1. मातृका पूजन एवं नांदी श्राद्ध
2. मुंडन एवं शास्त्रोक्त तीर्थ स्नान
3. मेखला, कौपीन एवं पलाश दण्ड धारण
4. तीन तंतु वाले पवित्र यज्ञोपवीत का मंत्रपूर्वक धारण
5. गुरु मुख से कान में गायत्री महामंत्र की दीक्षा
6. भिक्षाटन (मातृ-पितृ भिक्षा), महाहवन एवं आशीर्वाद
५. आवश्यक पावन पूजन सामग्री
इस वैदिक अनुष्ठान में १००% शुद्ध एवं प्राकृतिक शास्त्रीय सामग्री का उपयोग किया जाता है: कपास का सिद्ध जनेऊ, पलाश/बेल का दण्ड, मूंज की मेखला, पीला वस्त्र, मृगचर्म, समिधा, शुद्ध घृत, अक्षत एवं भिक्षा सामग्री।।
७. अवंतिका तीर्थ (उज्जैन) में अनुष्ठान का विशेष प्रभाव
महाकाल की पावन नगरी उज्जैन (अवंतिका) अनादि काल से मोक्ष और ग्रह शांति की तपोभूमि रही है। यह अनुष्ठान विशेष रूप से Ujjain, Madhya Pradesh पर वैदिक पुरोहितों द्वारा यजमान के नाम एवं गोत्र से संपन्न किया जाता है।
८. व्यक्तिगत संकल्प: साक्षात उपस्थिति अथवा लाइव वीडियो दर्शन
देश-विदेश के जो यजमान साक्षात उज्जैन आने में असमर्थ हैं, वे अपने नाम, गोत्र व नक्षत्र अनुसार लाइव ऑनलाइन संकल्प द्वारा भी इस अनुष्ठान को संपन्न करा सकते हैं। पूजनोपरांत अभिमंत्रित रक्षासूत्र, भस्म एवं महाप्रसाद डाक द्वारा यजमान के गृह पते पर प्रेषित किया जाता है।
पंडित बलराम व्यास
उज्जैन अवंतिका क्षेत्र के प्रतिष्ठित वैदिक पुरोहित। विगत 15+ वर्षों से श्री महाकालेश्वर, मंगलनाथ तीर्थ, सिद्धवट एवं रामघाट पर शास्त्रसम्मत विधि-विधान से कालसर्प दोष, मंगल भात पूजा, पितृ दोष शांति, महामृत्युंजय जप एवं संपूर्ण वैदिक अनुष्ठान संपन्न करा रहे हैं।
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