वैदिक अन्नप्राशन संस्कार एवं प्रथम आहार पूजन: संपूर्ण शास्त्रीय विधि, महत्व एवं उज्जैन में अनुष्ठान रहस्य
१. अनुष्ठान की पृष्ठभूमि एवं शास्त्रोक्त महत्व
सनातन धर्म के 16 संस्कारों में अन्नप्राशन अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। बालक के 6ठे अथवा 8वें माह में (बालिका के 5वें अथवा 7वें माह में) शुभ नक्षत्र में यह संस्कार किया जाता है। माता अन्नपूर्णा का ध्यान कर गाय के दूध की खीर शिशु को चटाई जाती है जिससे उसकी पाचन शक्ति, मेधा और तेज में वृद्धि होती है।
२. पूजा का मूल उद्देश्य एवं प्राप्त होने वाले फल
शिशु का उत्तम स्वास्थ्य, पाचन शक्ति, दीर्घायु, मेधा बुद्धि एवं जीवन भर अन्न-धन की प्रचुरता।
४. शास्त्रसम्मत पूजन विधि-विधान (क्रमबद्ध चरण)
1. स्वस्तिवाचन एवं बालक के कल्याण का संकल्प
2. गणेश, गौरी व नवग्रह स्थापन
3. मां अन्नपूर्णा का विशेष पूजन व खीर नैवेद्य
4. वैदिक आहुतियों द्वारा बाल रक्षा हवन
5. स्वर्ण/चांदी की चम्मच से शिशु को प्रथम क्षीर प्राशन
6. भविष्य परीक्षण (पुस्तक, कलम, स्वर्ण, शस्त्र, अन्न का चयन) व आशीर्वाद
५. आवश्यक पावन पूजन सामग्री
इस वैदिक अनुष्ठान में १००% शुद्ध एवं प्राकृतिक शास्त्रीय सामग्री का उपयोग किया जाता है: गाय के दूध की खीर, चांदी अथवा सोने की चम्मच/कटोरी, शहद, गंगाजल, नए वस्त्र, रोली, चावल, फल, फूल एवं हवन सामग्री।।
७. अवंतिका तीर्थ (उज्जैन) में अनुष्ठान का विशेष प्रभाव
महाकाल की पावन नगरी उज्जैन (अवंतिका) अनादि काल से मोक्ष और ग्रह शांति की तपोभूमि रही है। यह अनुष्ठान विशेष रूप से Ujjain, Madhya Pradesh पर वैदिक पुरोहितों द्वारा यजमान के नाम एवं गोत्र से संपन्न किया जाता है।
८. व्यक्तिगत संकल्प: साक्षात उपस्थिति अथवा लाइव वीडियो दर्शन
देश-विदेश के जो यजमान साक्षात उज्जैन आने में असमर्थ हैं, वे अपने नाम, गोत्र व नक्षत्र अनुसार लाइव ऑनलाइन संकल्प द्वारा भी इस अनुष्ठान को संपन्न करा सकते हैं। पूजनोपरांत अभिमंत्रित रक्षासूत्र, भस्म एवं महाप्रसाद डाक द्वारा यजमान के गृह पते पर प्रेषित किया जाता है।
पंडित बलराम व्यास
उज्जैन अवंतिका क्षेत्र के प्रतिष्ठित वैदिक पुरोहित। विगत 15+ वर्षों से श्री महाकालेश्वर, मंगलनाथ तीर्थ, सिद्धवट एवं रामघाट पर शास्त्रसम्मत विधि-विधान से कालसर्प दोष, मंगल भात पूजा, पितृ दोष शांति, महामृत्युंजय जप एवं संपूर्ण वैदिक अनुष्ठान संपन्न करा रहे हैं।
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